सिद्धार्थ बाबू की कहानी: निजी नौकरी छोड़ी, UPSC में चमके और बन गए विदेश सेवा अधिकारी
नई दिल्ली। दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वैश्विक राष्ट्राध्यक्षों के बीच कूटनीतिक संवाद में एक चेहरा लगातार छाया रहा—सिद्धार्थ बाबू। पीएम मोदी के आधिकारिक दुभाषिये (इंटरप्रेटर) के रूप में वे विदेशी नेताओं के साथ होने वाली अति-संवेदनशील बैठकों में बातचीत और भावनाओं को सटीक रूप से अनुवाद करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कॉरपोरेट जगत से भारतीय विदेश सेवा तक का सफर
सिद्धार्थ बाबू की पेशेवर यात्रा बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक रही है। पारंपरिक विदेश सेवा अधिकारियों से अलग, उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कॉरपोरेट क्षेत्र से की थी। इसके बाद उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया 15वीं रैंक हासिल की। शीर्ष रैंक होने के कारण उनके पास आईएएस (IAS) चुनने का पूरा मौका था, लेकिन उन्होंने भारतीय विदेश सेवा (IFS) को अपनी पहली पसंद बनाया।
कूटनीति में भाषा और संवाद का संवेदनशील महत्व
शीर्ष स्तर की कूटनीतिक बैठकों में दुभाषिये की भूमिका केवल शब्दों का अनुवाद करना नहीं होती। किसी भी वाक्य या शब्द के अर्थ का थोड़ा सा भी विचलन कूटनीतिक रिश्तों पर बड़ा असर डाल सकता है। ऐसे में भाषा के साथ-साथ दोनों देशों के राजनीतिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संदर्भों की गहरी समझ होना बेहद अनिवार्य माना जाता है, जिसमें सिद्धार्थ बाबू ने अपनी जबरदस्त पकड़ साबित की है।
ब्रिक्स सम्मेलन में शी जिनपिंग संग वार्ता में आई चर्चा
भारत मंडपम में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अन्य वैश्विक दिग्गजों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की उच्चस्तरीय वार्ताओं के दौरान सिद्धार्थ बाबू की त्वरित और सहज अनुवाद क्षमता स्पष्ट रूप से देखी गई। एक कॉरपोरेट पेशेवर से लेकर पीएम मोदी की कूटनीतिक टीम का मुख्य चेहरा बनने तक का उनका यह सफर भारतीय विदेश सेवा में भाषाई दक्षता और विशेषज्ञता की अहमियत को रेखांकित करता है।