संचिता सुषमा वाल्के 

सरकारी अस्पतालों को गरीबों की उम्मीद कहा जाता है, लेकिन जब यही अस्पताल लापरवाही का अड्डा बन जाएं तो सवाल सिर्फ एक डॉक्टर पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर खड़े होते हैं। सागर जिले की बण्डा तहसील से सामने आई घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में लापरवाही की कीमत अक्सर आम आदमी को अपनी जिंदगी से चुकानी पड़ती है।
महज 19 महीने का मासूम विनय विश्वकर्मा, जिसे बुखार और सामान्य इलाज की उम्मीद में अस्पताल ले जाया गया था, कथित चिकित्सकीय लापरवाही का ऐसा शिकार बना कि उसकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। आरोप है कि डॉक्टर ने आंखों में आई ड्रॉप की जगह नोजल ड्रॉप डाल दी। यदि यह आरोप जांच में सही साबित होता है, तो यह केवल एक "मेडिकल मिस्टेक" नहीं बल्कि घोर आपराधिक लापरवाही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज प्रयोगशाला की तरह किया जा रहा है? क्या दवाइयां देने से पहले डॉक्टर यह तक नहीं देख रहे कि कौन-सी दवा कहां इस्तेमाल की जानी है? यदि एक चिकित्सक इतनी बुनियादी सावधानी भी नहीं बरत सकता, तो फिर मरीज अपनी जान और भविष्य किस भरोसे उसके हाथों में सौंपे?
हर बार की तरह इस बार भी वही घिसा-पिटा जवाब सामने आया है—"जांच कमेटी बना दी गई है, दोषियों पर कार्रवाई होगी।" लेकिन जनता पूछ रही है कि आखिर कब तक? कितनी जांच समितियां बनीं, कितनी रिपोर्टें आईं और कितने दोषियों को वास्तव में ऐसी सजा मिली, जो भविष्य में किसी दूसरे डॉक्टर को लापरवाही करने से रोक सके?
एक मासूम की जिंदगी में हमेशा के लिए अंधेरा छा गया। उसकी आंखों की रोशनी लौटकर नहीं आएगी। ऐसे में केवल निलंबन या विभागीय कार्रवाई न्याय नहीं हो सकती। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित जिम्मेदारों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज होना चाहिए, पीड़ित परिवार को पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य जीवन बचाना है, जीवन बर्बाद करना नहीं। अगर सरकारी अस्पतालों में ऐसी लापरवाही पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो अगला शिकार कोई और मासूम होगा और फिर वही बयान, वही जांच और वही खोखले आश्वासन दोहराए जाएंगे।
अब फैसला सरकार को करना है—क्या वह दोषियों को बचाएगी या जनता का भरोसा?