संचिता सुषमा वाल्के 

भोपाल में हेलमेट और सीट बेल्ट जांच को लेकर पुलिस की नई व्यवस्था केवल अभियान का स्वरूप बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सड़क सुरक्षा को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी है। अब थाना स्तर पर अलग-अलग स्थानों पर होने वाली चेकिंग के बजाय प्रत्येक एसीपी संभाग में एक प्रमुख चेकिंग प्वाइंट बनाया जाएगा, जहां स्वयं एसीपी निगरानी करेंगे। तीन थानों की संयुक्त पुलिस टीम और ट्रैफिक स्टाफ दोनों लेन पर एक साथ कार्रवाई करेंगे, जिससे नियम तोड़कर यू-टर्न लेकर बच निकलने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।

दरअसल, हेलमेट और सीट बेल्ट को आज भी बड़ी संख्या में लोग केवल चालान से बचने का साधन मानते हैं, जबकि ये दोनों सुरक्षा उपकरण दुर्घटना की स्थिति में जीवन बचाने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। हर वर्ष होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में अनेक लोगों की जान सिर्फ इसलिए चली जाती है क्योंकि उन्होंने हेलमेट नहीं पहना या सीट बेल्ट नहीं लगाई थी। ऐसे में यदि पुलिस की कार्रवाई लोगों को नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करती है, तो इसे केवल दंडात्मक अभियान नहीं माना जाना चाहिए।

नई व्यवस्था की सबसे सकारात्मक बात यह है कि इसमें चालान के साथ-साथ लोगों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक भी किया जाएगा। कानून का भय आवश्यक है, लेकिन उससे अधिक जरूरी है नियमों के पीछे छिपे उद्देश्य को समझाना। जब नागरिक यह समझेंगे कि हेलमेट और सीट बेल्ट उनकी अपनी सुरक्षा के लिए हैं, तब नियमों का पालन स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।

हालांकि, इस अभियान की सफलता केवल पुलिस की सक्रियता पर निर्भर नहीं करेगी। यदि चेकिंग कुछ दिनों तक चलकर फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाती है, तो इसका प्रभाव भी सीमित रह जाएगा। सड़क सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है, जिसके लिए नियमित निगरानी, जनजागरूकता और नागरिकों का सहयोग तीनों समान रूप से आवश्यक हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और सम्मानजनक हो। नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और अभियान का उद्देश्य केवल राजस्व संग्रह नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं में कमी लाना ही दिखाई दे। तभी जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

सड़क पर निकलते समय हेलमेट पहनना और सीट बेल्ट लगाना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है। यदि भोपाल की नई व्यवस्था लोगों की इस सोच को बदलने में सफल होती है, तो यह केवल चालान की संख्या नहीं बढ़ाएगी, बल्कि सड़क हादसों और असमय होने वाली मौतों को भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आखिर किसी भी अभियान की सबसे बड़ी सफलता सरकारी आंकड़ों में नहीं, बल्कि सुरक्षित घर लौटते नागरिकों की मुस्कान में दिखाई देती है।