स्कूलों के विलय और ड्रॉपआउट पर पटवारी ने सरकार से पूछे सवाल
बोले- ‘यह पत्र नहीं, प्रश्न-पत्र है’; 2,426 स्कूल कम होने और बच्चों की बढ़ती दूरी पर मांगा जवाब
संचिता सुषमा वाल्के
भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी, स्कूलों के विलय और बच्चों के ड्रॉपआउट को लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से कई सवाल पूछे हैं। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र को पटवारी ने ‘प्रश्न-पत्र’ बताते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकारी दावों और विज्ञापनों के बीच जमीनी हकीकत पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।
पटवारी ने सवाल उठाया कि जब सरकार बढ़ते शिक्षा बजट, बेहतर परिणाम और नई योजनाओं को उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, तब हजारों स्कूलों के बंद या विलय होने को किस नीति की सफलता माना जाए। उन्होंने सरकार से 2025-26 में प्रदेश में कम हुए 2,426 स्कूलों का जिला-वार, विकासखंड-वार और स्कूल-वार पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग की।
स्कूल बंद हुए या मर्ज, सरकार बताए


कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने पूछा कि इन 2,426 स्कूलों में कितने स्कूल पूरी तरह बंद हुए, कितने दूसरे स्कूलों में मर्ज किए गए और किन प्रशासनिक आदेशों के तहत ये निर्णय लिए गए। उन्होंने यह भी सवाल किया कि मर्ज किए गए स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अब नए स्कूल तक पहुंचने के लिए पहले की तुलना में कितनी अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है।
पटवारी ने कहा कि स्कूलों के विलय का सबसे ज्यादा असर गरीब, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों पर पड़ सकता है, क्योंकि इन परिवारों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का सबसे सुलभ माध्यम हैं। उन्होंने सरकार से पूछा कि ऐसे क्षेत्रों में बच्चों के लिए परिवहन, साइकिल, बस या सुरक्षित आवागमन की वैकल्पिक व्यवस्था कितने स्कूलों में उपलब्ध कराई गई है।
15 लाख बच्चों के दावे पर भी सवाल
पत्र में पटवारी ने ‘स्कूल से बाहर’ बच्चों, ड्रॉपआउट बच्चों, दूसरे स्कूल में स्थानांतरित बच्चों और UDISE+ में दर्ज नहीं हो पाए बच्चों की अलग-अलग वास्तविक संख्या बताने की मांग की। उन्होंने 15 लाख बच्चों के पढ़ाई से दूर होने के दावे पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या यह आंकड़ा किसी प्रमाणित प्रशासनिक रिकॉर्ड पर आधारित है? यदि हां, तो इसकी जिला-वार सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
उन्होंने कहा कि यदि यह आंकड़ा प्रमाणित नहीं है तो सरकार को स्वयं वास्तविक संख्या सामने रखनी चाहिए और जनता को भ्रमित करने वाले आंकड़ों की जवाबदेही तय करनी चाहिए।
ड्रॉपआउट पर भी सरकार से जवाब मांगा
पटवारी ने माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट को लेकर भी सरकार से सवाल किए। उन्होंने UDISE+ 2025-26 में मध्य प्रदेश के कक्षा 9-10 के 13 प्रतिशत ड्रॉपआउट रेट का हवाला देते हुए पूछा कि हर 100 बच्चों में 13 बच्चों के स्कूल छोड़ने के पीछे प्रमुख कारण क्या हैं।
उन्होंने कक्षा 8 से 9 और कक्षा 10 से 11 में शिक्षा व्यवस्था से बाहर होने वाले बच्चों की संख्या तथा दोबारा स्कूल से जोड़ने के लिए किए गए प्रयासों का ब्यौरा भी मांगा। लड़कों का माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट 14.7 प्रतिशत और लड़कियों का 11.3 प्रतिशत होने का उल्लेख करते हुए पटवारी ने पूछा कि लड़कों के अधिक ड्रॉपआउट के कारणों पर सरकार ने कोई विशेष अध्ययन कराया है या नहीं।
स्कूल घटे, शिक्षक बढ़े—तैनाती पर भी सवाल
पटवारी ने सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2024-25 में प्रदेश में 1,22,120 स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर 1,19,694 रह गए। वहीं शिक्षकों की संख्या 6,82,492 से बढ़कर 6,92,820 हो गई।
उन्होंने सवाल किया कि जब प्रदेश में 2,426 स्कूल कम हुए तो बढ़े हुए शिक्षकों की तैनाती कहां और किस आधार पर की गई। साथ ही बंद या मर्ज किए गए स्कूलों के भवन, जमीन, फर्नीचर, प्रयोगशालाओं और अन्य संसाधनों के इस्तेमाल का ब्यौरा भी सरकार से मांगा।
तीन साल में स्कूल बंद नहीं करने की मांग
पटवारी ने मुख्यमंत्री से पूछा कि क्या सरकार अगले तीन वर्षों में ऐसा कोई सरकारी स्कूल बंद या मर्ज नहीं करने की गारंटी देगी, जिसके कारण बच्चों को पहले से अधिक दूरी तय करनी पड़े। उन्होंने प्रत्येक बंद या मर्ज स्कूल की सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट कराने की मांग भी की, ताकि यह सामने आ सके कि फैसले के बाद वहां पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे की शिक्षा किस स्थिति में पहुंची।
पत्र के अंत में पटवारी ने सरकार की शिक्षा नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि लक्ष्य हर बच्चे को स्कूल में लाना और उसे 12वीं तक शिक्षा व्यवस्था में बनाए रखना है, तो स्कूलों की संख्या घटाना और बच्चों की स्कूल तक दूरी बढ़ाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि बच्चों के स्कूल से बाहर होने के लिए केवल परिवारों को जिम्मेदार ठहराना शिक्षा नीति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का तरीका है।