राजीव गांधी: भविष्य को वर्तमान में देखने वाला नेतृत्व
संचिता सुषमा वाल्के
भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ नेता ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपने समय की सीमाओं से आगे जाकर आने वाले भारत की कल्पना की। राजीव गांधी उन्हीं नेताओं में एक थे। महज 40 वर्ष की आयु में देश के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी का कार्यकाल अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव और विवादों से भरा रहा, लेकिन इसी दौर में भारत ने तकनीक, दूरसंचार, शिक्षा, युवा भागीदारी और प्रशासनिक आधुनिकीकरण की दिशा में कई ऐसे कदम उठाए, जिनका प्रभाव आने वाले दशकों में दिखाई दिया।
राजीव गांधी की राजनीति की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि वे भारत को केवल तत्कालीन समस्याओं से निकालने की नहीं, बल्कि बदलती दुनिया के लिए तैयार करने की बात करते थे। उनके सामने एक ऐसा भारत था जहां कंप्यूटर और आधुनिक संचार सुविधाएं अभी सीमित थीं, गांवों तक विकास की गति असमान थी और प्रशासन का बड़ा हिस्सा पारंपरिक प्रक्रियाओं पर निर्भर था। ऐसे समय में उन्होंने विज्ञान और तकनीक को विकास का साधन बनाने की कोशिश की।
युवा भारत पर विश्वास
राजीव गांधी सरकार का एक ऐतिहासिक निर्णय 18 वर्ष की आयु में मतदान का अधिकार देना था। 61वें संविधान संशोधन के माध्यम से मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई। यह फैसला भारतीय लोकतंत्र में युवा पीढ़ी की भागीदारी का विस्तार करने वाला महत्वपूर्ण कदम था।
यह केवल मतदान की उम्र घटाने का संवैधानिक फैसला नहीं था। इसके पीछे यह विश्वास भी था कि देश की युवा आबादी केवल भविष्य की शक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान लोकतंत्र की सक्रिय भागीदार है। आज जब भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है, तब इस निर्णय का महत्व और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
लोकतंत्र को गांव तक ले जाने की कोशिश
राजीव गांधी का मानना था कि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी संभव है जब निर्णय लेने की प्रक्रिया गांव और स्थानीय समुदायों तक पहुंचे। पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मजबूती देने की दिशा में उनके प्रयास इसी सोच का हिस्सा थे।
यद्यपि उनके कार्यकाल में प्रस्तावित पंचायती राज संबंधी संवैधानिक पहल तत्काल कानून नहीं बन सकी, लेकिन विकेंद्रीकरण का यह विचार आगे चलकर 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में मूर्त रूप में सामने आया। इस दृष्टि से राजीव गांधी ने स्थानीय स्वशासन को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में भूमिका निभाई।
शिक्षा में आधुनिकता और समान अवसर
राजीव गांधी के दौर में शिक्षा को केवल साक्षरता तक सीमित रखने के बजाय गुणवत्ता और आधुनिकता से जोड़ने का प्रयास हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 ने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा तय की।
इसी दौर में जवाहर नवोदय विद्यालयों की अवधारणा सामने आई, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराना था। ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड के माध्यम से प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षण संसाधनों को बेहतर बनाने का प्रयास किया गया।
1985 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय यानी IGNOU की स्थापना ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ा। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से ऐसे लोगों के लिए भी उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े, जो पारंपरिक विश्वविद्यालयों तक आसानी से नहीं पहुंच सकते थे।
कंप्यूटर से लेकर टेलीकॉम तक—एक नए भारत की नींव
राजीव गांधी की सबसे चर्चित विरासत भारत की कंप्यूटर और दूरसंचार क्रांति से जुड़ी है। यह वह दौर था जब कंप्यूटर को लेकर समाज में आशंकाएं थीं और तकनीकी बदलाव को लेकर रोजगार पर प्रभाव की बहस चल रही थी। राजीव गांधी ने इसके विपरीत तकनीक को भारत के विकास की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा।
कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को प्रोत्साहन, सरकारी व्यवस्थाओं में कंप्यूटरीकरण और रेलवे आरक्षण जैसी सेवाओं के आधुनिकीकरण ने भारत में डिजिटल परिवर्तन की शुरुआती जमीन तैयार की।
दूरसंचार क्षेत्र में सी-डॉट जैसी संस्थाओं के माध्यम से स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर जोर दिया गया। एमटीएनएल और डिजिटल टेलीफोन एक्सचेंजों के विस्तार तथा ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में संचार सुविधाएं पहुंचाने के प्रयासों ने भारत की संचार व्यवस्था को बदलने की प्रक्रिया को गति दी। आगे चलकर जिस टेलीफोन और संचार नेटवर्क ने देश के आर्थिक और सामाजिक जीवन को बदल दिया, उसकी शुरुआती आधारभूत संरचना इसी दौर में मजबूत हुई।
तकनीक केवल कंप्यूटर नहीं, आम आदमी का साधन
राजीव गांधी की तकनीकी सोच की खासियत यह थी कि वे तकनीक को केवल उद्योग या कंप्यूटर तक सीमित नहीं देखते थे। उनके नेतृत्व में टेक्नोलॉजी मिशन के माध्यम से पेयजल, टीकाकरण, साक्षरता, तिलहन उत्पादन और दूरसंचार जैसी आम नागरिकों से जुड़ी समस्याओं के समाधान में विज्ञान और तकनीक के उपयोग पर बल दिया गया।
यह दृष्टिकोण आज के उस विचार से काफी हद तक मेल खाता है जिसमें तकनीक को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाकर शासन और विकास को अधिक प्रभावी बनाने की बात की जाती है।
राजनीति में अनुशासन का प्रयास
1985 का 52वां संविधान संशोधन भी राजीव गांधी सरकार की महत्वपूर्ण पहलों में शामिल था। इसके माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना था।
समय के साथ इस कानून की प्रभावशीलता और इसकी कमियों पर बहस होती रही है, लेकिन भारतीय राजनीति में दल-बदल की समस्या से निपटने के लिए यह एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रयास था।
संघर्ष के बीच संवाद की राजनीति
राजीव गांधी के कार्यकाल में देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे राजनीतिक और सशस्त्र संघर्षों से निपटने के लिए संवाद और समझौते का रास्ता अपनाया गया। 1985 का असम समझौता, पंजाब में राजीव-लोंगोवाल समझौता और 1986 का मिजोरम शांति समझौता इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
विशेष रूप से मिजोरम समझौते को भारतीय संघवाद और लोकतांत्रिक समाधान की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे संघर्ष के बाद मिजोरम को शांति और लोकतांत्रिक मुख्यधारा में लाने की प्रक्रिया भारतीय राजनीति में संवाद की शक्ति का उल्लेखनीय उदाहरण बनी।
पर्यावरण के प्रति बढ़ती चिंता
विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन की आवश्यकता को भी राजीव गांधी के कार्यकाल में अधिक संस्थागत महत्व मिला। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 ने पर्यावरणीय प्रदूषण से निपटने के लिए देश के कानूनी ढांचे को मजबूत किया।
इसी दौर में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई। गंगा की सफाई को राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम के रूप में सामने लाने का यह शुरुआती बड़ा प्रयास था। हालांकि गंगा सफाई की चुनौती आज भी कायम है, लेकिन नदी संरक्षण को राष्ट्रीय नीति के केंद्र में लाने के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण कदम था।
आर्थिक आधुनिकीकरण की शुरुआत
राजीव गांधी का आर्थिक दृष्टिकोण भी तकनीक और उत्पादकता से प्रभावित था। कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार और आधुनिक उद्योगों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों ने भारतीय उद्योग को बदलती वैश्विक तकनीकी अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
बाद के दशकों में भारत में आई आर्थिक उदारीकरण और तकनीकी क्रांति के पीछे कई कारकों की भूमिका रही, लेकिन यह भी तथ्य है कि 1980 के दशक में तकनीकी आधुनिकीकरण को लेकर शुरू हुई बहस ने आगे के बदलावों के लिए एक वैचारिक और संस्थागत आधार तैयार किया।
ऑपरेशन कैक्टस और भारत की क्षेत्रीय भूमिका
1988 में मालदीव में तख्तापलट की कोशिश के दौरान भारत ने वहां की सरकार के अनुरोध पर ऑपरेशन कैक्टस चलाया। भारतीय सुरक्षा बलों की त्वरित कार्रवाई ने संकट को नियंत्रित करने में मदद की। इस अभियान ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और सैन्य क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
एक नेता, जिसकी विरासत बहस से परे नहीं
राजीव गांधी की विरासत का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों के आधार पर करना भी उचित नहीं होगा। उनके कार्यकाल में बोफोर्स विवाद, श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का निर्णय और अन्य राजनीतिक घटनाएं भी हुईं, जिन पर आज तक गंभीर बहस होती है। इसलिए राजीव गांधी को समझने का सही तरीका न तो उन्हें केवल एक तकनीकी आधुनिकतावादी के रूप में देखना है और न ही केवल उनके विवादों के आधार पर उनका मूल्यांकन करना।
उनकी राजनीतिक विरासत उपलब्धियों, महत्वाकांक्षाओं, सफलताओं, असफलताओं और विवादों—सभी का सम्मिलित रूप है।
भविष्य की ओर देखने वाली दृष्टि
फिर भी, राजीव गांधी के नेतृत्व की सबसे विशिष्ट पहचान उनकी भविष्य-दृष्टि थी। उन्होंने उस समय कंप्यूटर, दूरसंचार, विज्ञान, आधुनिक शिक्षा और युवा शक्ति को राष्ट्रीय विकास के केंद्र में रखने की बात की, जब भारत इन क्षेत्रों में अभी शुरुआती दौर में था।
आज भारत की पहचान दुनिया की प्रमुख आईटी शक्तियों, डिजिटल अर्थव्यवस्था और तेजी से विकसित होते दूरसंचार बाजार के रूप में है। यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति या एक सरकार की देन नहीं है। इसके पीछे दशकों की नीतियां, वैज्ञानिकों और तकनीशियनों का योगदान, उद्यमिता, निजी क्षेत्र, संस्थागत विकास और बाद की सरकारों के निर्णय शामिल हैं। लेकिन इस लंबी यात्रा के शुरुआती महत्वपूर्ण पड़ावों में राजीव गांधी के दौर की पहलों को निश्चित रूप से स्थान दिया जा सकता है।
राजीव गांधी की जयंती इसलिए केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि यह विचार करने का भी अवसर है कि किसी राष्ट्र को भविष्य के लिए तैयार करने का अर्थ क्या होता है। युवा शक्ति पर विश्वास, तकनीक को विकास का माध्यम बनाना, शिक्षा का विस्तार, संचार व्यवस्था को मजबूत करना और सत्ता को जनता के करीब ले जाने की कोशिश—ये वे विचार थे जिन्होंने 1980 के दशक के भारत में नई बहस को जन्म दिया।
राजीव गांधी अपने समय से आगे की कई बातें कर रहे थे। उनके सपनों का भारत आज भी पूरी तरह साकार नहीं हुआ है, लेकिन आधुनिक, तकनीक-सक्षम और युवा भारत की यात्रा में उनके कार्यकाल को एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाता रहेगा।
भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
उनकी स्मृति को नमन और उनके आधुनिक भारत के स्वप्न को सादर स्मरण। 🙏🇮🇳