सत्य पर खामोशी क्यों?
संचिता सुषमा वाल्के
जब आस्था का विषय हो, तब सबसे पहले सत्य की रक्षा होनी चाहिए। अगर किसी मंदिर, ट्रस्ट या धार्मिक संस्था पर भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता के आरोप लगते हैं, तो उन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना लोकतंत्र और धर्म—दोनों की मांग है।
दुर्भाग्य यह है कि आज समाज का बड़ा वर्ग मुद्दों को सत्य और असत्य के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक चश्मे से देखने लगा है। जब आरोप विरोधी पर हों तो शोर मचता है, लेकिन जब सवाल अपने पक्ष पर उठें तो खामोशी छा जाती है। यही दोहरा मापदंड सबसे बड़ी चिंता है।
भगवान राम मर्यादा, न्याय और सत्य के प्रतीक हैं। उनके नाम पर बनी किसी भी व्यवस्था पर यदि सवाल उठते हैं, तो सबसे पहले सत्य सामने आना चाहिए। क्योंकि राम का नाम किसी भ्रष्टाचार को ढाल नहीं बना सकता और न ही किसी निर्दोष को बिना प्रमाण दोषी ठहराया जा सकता है।
Bhagavad Gita में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि धर्म और सत्य के पक्ष में खड़े होने से पीछे मत हटो। इसका अर्थ यह नहीं कि बिना प्रमाण आरोप लगाए जाएँ, बल्कि यह कि सत्य की निष्पक्ष खोज से कभी समझौता न हो।
याद रखिए—
सत्य किसी दल का नहीं होता, सत्य केवल सत्य होता है।
जो सच के साथ खड़ा है, वही धर्म के साथ खड़ा है।
और जो सवाल पूछने से डरता है, वह लोकतंत्र और आस्था—दोनों को कमजोर करता है।
"सत्य के लिए लड़ो, व्यक्ति के लिए नहीं। न्याय के लिए आवाज़ उठाओ, भीड़ के लिए नहीं।"